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मुक्ति की आकांक्षा

19 Sep

चिड़िया को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहॉं हवा में उन्‍हें
अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।

यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।

बाहर दाने का टोटा है,
यहॉं चुग्‍गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

फिर भी चिड़िया
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।
– सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

 
4 Comments

Posted by on September 19, 2012 in Sarveshwar Dayal Saxena

 

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4 responses to “मुक्ति की आकांक्षा

  1. mona wazarlar

    September 2, 2014 at 2:32 PM

    kindly let me know in which class and curriculum this poem is been thought.

     
  2. zimbie

    May 13, 2015 at 11:37 AM

    it is nice a poem !

     
    • natasha

      May 13, 2015 at 11:38 AM

      yes it is but not you

       
  3. suraj

    October 22, 2015 at 7:31 AM

    Can u plz post the poem “na na prabhu shakti nahi maangunga tumse, arjit karunga ladkar”

     

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