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खूनी हस्‍ताक्षर

09 Jul

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं ।

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है ।
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है ।

उस दिन लोगों ने सही-सही
खून की कीमत पहचानी थी ।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मॉंगी उनसे कुरबानी थी ।

बोले, “स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा ।
तुम बहुत जी चुके जग में,
लेकिन आगे मरना होगा ।

आज़ादी के चरणों में जो,
जयमाल चढ़ाई जाएगी ।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूँथी जाएगी ।

आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है”

यूँ कहते-कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया ।
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
दमकी उनकी रक्तिम काया ।

आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, “रक्त मुझे देना ।
इसके बदले भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना।”

हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे ।
स्वर इनकलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे ।

“हम देंगे-देंगे खून”
शब्द बस यही सुनाई देते थे ।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे ।

बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को
सर्वस्व-समर्पण करना है ।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है ।

पर यह साधारण पत्र नहीं,
आज़ादी का परवाना है ।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्जवल रक्त गिराना है ।

वह आगे आए जिसके तन में
खून भारतीय बहता हो ।
वह आगे आए जो अपने को
हिंदुस्तानी कहता हो ।

वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर करता हो ।
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए
जो इसको हँसकर लेता हो ।”

सारी जनता हुंकार उठी-
हम आते हैं, हम आते हैं ।
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढाते हैं ।

साहस से बढ़े युबक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आते थे ।
चाकू-छुरी कटारियों से,
वे अपना रक्त गिराते थे ।

फिर उस रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे ।
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे ।

उस दिन तारों ने देखा था
हिंदुस्तानी विश्वास नया ।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने
ख़ूँ से अपना इतिहास नया ।

– गोपालप्रसाद व्यास

 
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Posted by on July 9, 2012 in Gopalprasad Vyas

 

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