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अब अकेली टहल रही होगी

30 Sep

चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ़-सी पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
वो एक शम-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

-दुश्यंत कुमार

 
1 Comment

Posted by on September 30, 2011 in Dusyant Kumar

 

Tags: , , ,

One response to “अब अकेली टहल रही होगी

  1. Beadab

    October 1, 2011 at 6:59 PM

    Garav g bahut bahut sukriya, is kavita ko post karne k liye…….

     

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